Humanities and Development https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had <p>The Humanities and Development&nbsp; (HD) is an open access, peer-reviewed and refereed journal published by Manav Samaj <span class="SpellE">Sewa</span> Samiti Regd. (Centre for Research and Development Studies). The main objective of HD is to provide an intellectual platform to the international as well as Indian scholars. HD aims to promote multi-disciplinary studies in humanities, social sciences and other disciplines&nbsp; and has become the leading journal in multi-disciplinary approach.</p> <p>The journal publishes research papers in the fields of humanities and social science such as&nbsp;Anthropology, Business Studies, Communication Studies, Corporate Governance, Criminology, Cross-Cultural Studies, Demography, Development Studies, Economics, Education, Ethics, Geography, History, Industrial Relations, Information Science, International Relations, Law, Linguistics, Library Science, Media Studies, Methodology, Philosophy, Political Science, Population Studies, Psychology, Public Administration, Sociology, Social Welfare, Literature, Paralegal, Performing Arts (Music, Theatre &amp; Dance), Religious Studies, Visual Arts, Women Studies, Medical as well as Science And Technical Studies&nbsp;and so on.</p> <p>The journal publishes original papers, review papers, conceptual framework, analytical and simulation models, case studies, empirical research, technical notes, and book reviews. Special Issues devoted to important topics in humanities and social science are occasionally published.</p> Centre for Research and Development Studies en-US Humanities and Development 0973-8541 भारत एक राष्ट्र के रूप में https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/291 <p>भारतीय चिन्तन परम्परा में एक राष्ट्र के रूप में भारत का स्वरूप अपने आप में एक अत्यत्न व्यापक अवधारणा को समाहित किये हुए है। भारत लम्बे समय तक विदेशी आक्रान्ताओं के अधीन रहा जिसके कारण समाज में अनेक विविधताएँ दृष्टिगोचर हुई लेकिन फिर भी भारतीय समाज अपने मूल सिद्धान्तों को आत्मसात किये रखा। और अपने सांस्कृतिक बंधन को बनाये रखा। जिसने चिरकाल से ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकता की डोर में बांधे रखा है। जहां पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा नस्लीय, जातीय और राज्य आधारित है। जिसकी तुलना भारत से नहीं की जा सकती है। भारत का प्राकृतिक स्वरूप ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है। जिसका भाव अतीत काल से लेकर वर्तमान काल तक निरिन्तर प्रवाहमान दिखाई दे रहा है। त्योहार, रीति-रिवाज परम्पराएँ इतिहास, भूगोल आदि के माध्यम से राष्ट्र की अभिव्यक्ति होती है। राष्ट्र भारतीय राजनीतिक चिंतन परम्परा का आधार रहा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में दर्शन हमें हमारे मनीषियों द्वारा किये गये वैदिक मंत्रों में स्पष्ट दिखाई देता है। इस तरह के राष्ट्र की मान्यता पाश्चात्य चिन्तन में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है।</p> अखिलेश कुमार अवध नारायण ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 4– 6 4– 6 वर्तमान सामाजिक परिवेश में परिवार की बदलती भूमिका https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/292 <p>परिवार मानव समाज की पूर्णतः मौलिक एवं सार्वभौमिक इकाई है। हम में से प्रत्येक किसी न किसी परिवार का सदस्य है। परिवार एक मात्र प्राकृतिक समूह है प्राणी शास्त्रीय सम्बन्धों के आधार पर बहुत से समूहों का निर्माण होता है। मानव का सम्पूर्ण जीवन समाज में व्यतीत होता है। समाज व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करता है। परिवार के मूल में स्त्री-पुरूष है और समाज में परिवार की केन्द्रीय स्थिति होती है। वास्तव में परिवार समाज की आधार भूत इकाई है। परिवार से ही समाज का विस्तार हुआ है और उस पर ही प्रत्येक समाज का जीवित रहना निर्भर करता है। परिवार सन्तानोत्पत्ति द्वारा समाज के लिए नवीन सदस्यों की भर्ती करता है, जो मृत व्यक्तियों के रिक्त स्थान की पूर्ति करते रहते हैं और इस प्रकार की निरन्तरता बनाये रखते हैं।</p> अजय कुमार सिंह मनोज कुमार वत्स ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 7 10 कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका (एक शोधपरक विश्लेषण) https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/293 <p>प्रस्तुत शोध अध्ययन ‘कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका’ का एक समाज शास्त्री विश्लेषण है। उक्त अध्ययन में बदलते सामाजिक परिवेश में कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका व इसके प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। एतिहासिक रुप से महिलाओं को घर परिवार सम्भालने की जिम्मेदारी दी गयी तथा मुख्य आर्थिक गतिविधियों से दूर रखा गया है। परन्तु समय के प्रभाव में महिलाओं ने न केवल प्रमुख क्षेत्रों में महत्वपूर्ण आर्थिक व प्रबन्धकीय दायित्व को सम्भाला है अपितु अनेक प्रशासनिक व आर्थिक निकायों का नेतृत्व भी कर रही हैं। आशा है कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका का समाज शास्त्री अध्ययन प्रस्तुत करता यह शोध प्रस्ताव इस दिशा में एक सार्थक प्रयास सिद्ध होगा।</p> अनामिका जायसवाल अखिलेश त्रिपाठी ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 भारत एक राष्ट्र के रूप में https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/299 <p>भारतीय चिन्तन परम्परा में एक राष्ट्र के रूप में भारत का स्वरूप अपने आप में एक अत्यत्न व्यापक अवधारणा को समाहित किये हुए है। भारत लम्बे समय तक विदेशी आक्रान्ताओं के अधीन रहा जिसके कारण समाज में अनेक विविधताएँ दृष्टिगोचर हुई लेकिन फिर भी भारतीय समाज अपने मूल सिद्धान्तों को आत्मसात किये रखा। और अपने सांस्कृतिक बंधन को बनाये रखा। जिसने चिरकाल से ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकता की डोर में बांधे रखा है। जहां पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा नस्लीय, जातीय और राज्य आधारित है। जिसकी तुलना भारत से नहीं की जा सकती है। भारत का प्राकृतिक स्वरूप ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है। जिसका भाव अतीत काल से लेकर वर्तमान काल तक निरिन्तर प्रवाहमान दिखाई दे रहा है। त्योहार, रीति-रिवाज परम्पराएँ इतिहास, भूगोल आदि के माध्यम से राष्ट्र की अभिव्यक्ति होती है। राष्ट्र भारतीय राजनीतिक चिंतन परम्परा का आधार रहा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में दर्शन हमें हमारे मनीषियों द्वारा किये गये वैदिक मंत्रों में स्पष्ट दिखाई देता है। इस तरह के राष्ट्र की मान्यता पाश्चात्य चिन्तन में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है।</p> अखिलेश कुमार अवध नारायण ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 वर्तमान सामाजिक परिवेश में परिवार की बदलती भूमिका https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/300 <p>सारांश- परिवार मानव समाज की पूर्णतः मौलिक एवं सार्वभौमिक इकाई है। हम में से प्रत्येक किसी न किसी परिवार का सदस्य है। परिवार एक मात्र प्राकृतिक समूह है प्राणी शास्त्रीय सम्बन्धों के आधार पर बहुत से समूहों का निर्माण होता है। मानव का सम्पूर्ण जीवन समाज में व्यतीत होता है। समाज व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करता है। परिवार के मूल में स्त्री-पुरूष है और समाज में परिवार की केन्द्रीय स्थिति होती है। वास्तव में परिवार समाज की आधार भूत इकाई है। परिवार से ही समाज का विस्तार हुआ है और उस पर ही प्रत्येक समाज का जीवित रहना निर्भर करता है। परिवार सन्तानोत्पत्ति द्वारा समाज के लिए नवीन सदस्यों की भर्ती करता है, जो मृत व्यक्तियों के रिक्त स्थान की पूर्ति करते रहते हैं और इस प्रकार की निरन्तरता बनाये रखते हैं।</p> अजय कुमार सिंह मनोज कुमार वत्स ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका (एक शोधपरक विश्लेषण) https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/301 <p>सारांश: प्रस्तुत शोध अध्ययन ‘कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका’ का एक समाज शास्त्री विश्लेषण है। उक्त अध्ययन में बदलते सामाजिक परिवेश में कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका व इसके प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। एतिहासिक रुप से महिलाओं को घर परिवार सम्भालने की जिम्मेदारी दी गयी तथा मुख्य आर्थिक गतिविधियों से दूर रखा गया है। परन्तु समय के प्रभाव में महिलाओं ने न केवल प्रमुख क्षेत्रों में महत्वपूर्ण आर्थिक व प्रबन्धकीय दायित्व को सम्भाला है अपितु अनेक प्रशासनिक व आर्थिक निकायों का नेतृत्व भी कर रही हैं। आशा है कामकाजी महिलाओं की परिवार में बदलती भूमिका का समाज शास्त्री अध्ययन प्रस्तुत करता यह शोध प्रस्ताव इस दिशा में एक सार्थक प्रयास सिद्ध होगा।</p> अनामिका जायसवाल अखिलेश त्रिपाठी ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 तन्त्र-साधना अगस्त्य के शक्तिसूत्र के अनुसार में ‘शक्तितत्त्व’ https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/302 <p>शोध सारांश भारतीय संस्‟ति और साधना के गूढ़तम तत्त्वों का अनुसन्धान करने वाले महातन्त्रयोगियों की २ढ़ धारणा थी कि भारतीय साधना विश्व की प्राचीनतम संस्‟ति या विश्व मानव की साधना है। तन्त्रयोगियों ने गुह्यतम एवं लुप्त प्रायः तन्त्रज्ञान को हमारे समक्ष हस्तामलकवत् रखा है। यतोहि तन्त्र-उपासना प्रधान शास्त्र है और आदि शिव तथा आदि पार्वती उपास्य देवता है। तन्त्रयोगियों के पास अनुभवसिद्ध ज्ञान का अक्षय भण्डार था जिसे उन्होंने अपने समग्र जीवन में स्वाध्याय एवं साधना द्वारा अभिसिञ्चित किया था। तन्त्र-साधना से सम्बन्धित साहित्य पर विहङ्गालोकन किया जाए तब वह एक महार्णव की भांति ही २ष्टिगोचर होता है। अत एव प्रस्तुत शोध-पत्र तन्त्र -साधना में अगस्त्य के शक्तिसूत्र के अनुसार ‘शक्तितत्त्व’ श्रीसाधना के सन्दर्भ में प्रस्तुत विचारों को आगम परम्परा के मूल ग्रन्थों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है। वैदिक विद्या में श्रीविद्या सर्वाेच्च विद्या है इसी का अपररूप गायत्री मन्त्र में स्फुरित हुआ है। देव्युपनिषद् एवम् अथर्ववेद सौभाग्य खण्ड में इस विद्या को रहस्यात्मक आवरण या प्रतीक शब्दावली में कहा गया है-</p> मीनाक्षी जोशी ‘शाङ्करी’ ##submission.copyrightStatement## 2025-09-05 2025-09-05 20 03 प्रतिरुप मंत्रिमण्डल के रुप में विपक्ष की भूमिका https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/303 <p>प्रतिरुप मंत्रिमण्डल का आशय सरकार के मंत्रिमण्डल जैसा वैकल्पिक मंत्रिमण्डल जिसकी परिकल्पना विपक्ष द्वारा की जाती है। इस वैकल्पिक मंत्रिमण्डल में विपक्ष के प्रमुख नेता सरकार द्वारा गठित मंत्रिमण्डल के स्वरूप जैसा ही मंत्रालय बनाकर मंत्री नियुक्त किये जाते हैं। वह वास्तविक मंत्रिमण्डल का भाग न होकर केवल ‘प्रतिरुप मंत्री’ कहलाते हैं। इस प्रकार के मंत्रियों का उत्तरदायित्व सरकार द्वारा गठित मंत्रलायों की नीतियों, योजनाओं और कार्यों पर दृष्टि रखना होता है। साथ ही प्रतिरुप मंत्रियों का कार्य जनता के बीच जा कर अपना वैकल्पिक सुझाव तथा दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है, जिससे सरकार द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमांे का जनमानस के बीच उचित क्रियान्वयन हो सके साथ ही सरकार की अनुचित नीतियों को जनमानस के बीच रखकर उसका विरोध कर सरकार को उत्तरदायी ठहराया जा सके।</p> कुमुद रंजन वेद प्रकाश ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 औद्योगिक उपक्रमांे का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/304 <p>शोध-सार भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 1991 के आर्थिक उदारीकरण के पश्चात् औद्योगिक विकास तीव्र गति से बढ़ा, उद्योगों का विस्तार नगरीय क्षेत्र तक सीमित न होकर ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। वास्तव में ग्रामीण सामाजिक संरचना को औद्योगिक गतिविधियों ने बड़ी गहराई तक प्रभावित किया है। ग्रामीण जीवन पर औद्योगिक उपक्रमों का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रही है। जहाँ ग्रामीण परिवेश में भी रोजगार, आय और तकनीकी उद्योग का प्रचलन बढ़ा है, वहीं औद्योगिक इकाईयों से वायु, जल और भूमि प्रदूषण का प्रभाव बढ़ा है। खाद्य सुरक्षा पर भी संकट आया। औद्योगिक अधिग्रहण से कहीं न कहीं किसानों में भूमिहीनता भी बढ़ी, सिंचाई के स्रोत प्रभावित हुए। साथ ही ग्रामीण समाज में आधुनिकता, शिक्षा रोजगार के साथ विकास कार्य हो रहा है।</p> अवधेश मौर्या सुधांशु वर्मा ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 ‘‘महिला सशक्तिकरण में संविधान एवं शिक्षा की भूमिका’’ https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/305 <p>शोध-सार वर्तमान आधुनिक भारतीय सामाज के समग्र विकास में संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जब महिलाऐं शिक्षित, आत्मनिर्भर एवं निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्षम होती हैं तभी समाज में समानता, न्याय और प्रगति का मार्ग प्रशक्त होता है। वास्तविक भारत के निर्माण में महिलाओं की भूमिका पुरुषों से कम नहीं है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में संविधान और शिक्षा दोनों का अतुलनीय प्रयास रहा है। संविधान में भारत के नागरिकों (महिला एवं पुरुष) के लिए मूल अधिकारों के अतिरिक्त समानता, स्वतंत्रता और न्याय की गारण्टी दी गयी है।1 संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के द्वारा उन समानताओं को दूर करने का प्रयास किया गया है जिससे महिलाऐं पीड़ित थी।2 भारतीय संविधान के माध्यम से ही समाज के सभी वर्गों के साथ-साथ महिलाओं की शिक्षा का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो सका है।</p> कुमारी स्मिता सिन्हा ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 श्भारत में लैंगिक असमानता का विश्लेषणरू चुनौतियाँ, प्रगति और संभावनाश् https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/306 <p>भारत में लैंगिक असमानता एक दीर्घकालिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौती रही है। ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति और निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में पुरुषों के समान अवसर नहीं मिल पाए। यद्यपि स्वतंत्रता के पश्चात् और विशेषकर संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार, पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं का आरक्षण, शिक्षा के प्रसार तथा सरकारी योजनाओं के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी व्यवहारिक स्तर पर असमानता विभिन्न रूपों में विद्यमान है। वेतन असमानता, बाल विवाह, लैंगिक हिंसा, महिला स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ और रोजगार में असमान भागीदारी जैसे मुद्दे आज भी गंभीर हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लैंगिक असमानता के विरुद्ध शिक्षा, जागरूकता, विधिक सशक्तिकरण और तकनीकी सहभागिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही, महिला उद्यमिता, नेतृत्व और डिजिटल मंचों पर बढ़ती उपस्थिति भविष्य की संभावनाओं को रेखांकित करती है। अतः भारत में लैंगिक समानता की दिशा में की गई प्रगति को और अधिक सु२ढ़ करने के लिए सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन, नीतिगत प्रतिबद्धता तथा सतत प्रयास आवश्यक हैं।</p> अंशु पांडेय शालिनी कुमारी ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 Politics of Silence in The Thousand Faces of Night https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/307 <p>This paper explores the multifaceted politics of silence in Githa Hariharan‘s ―The Thousand Faces of Night (1992)‖, a landmark feminist text in Indian English literature. The novel redefines silence not merely as muteness or passivity but as a deeply political and psychological phenomenon intertwined with patriarchy, cultural memory, and identity. Through the interconnected lives of Mayamma, Sita, and Devi, Hariharan examines how silence functions as both oppression and resistance, as well as how myths and traditions sanctify and perpetuate women‘s muteness. The paper also analyses the intergenerational transmission of silence, its reinterpretation through feminist perspectives, and its eventual transformation into a language of resistance and self-assertion</p> Snigdha Mishra ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 Identification of 12th Jyotirlinga of Ghushmeshwara Mahadev: A fresh approach https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/308 <p>.</p> Anushka Ojha ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 Predictors of Values as Learning Outcome of IX Graders in Social Science https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/309 <p>The present study aims to determine the predictors of value based learning outcome in social science on the sample of 1145 IX class students of three districts of North Haryana viz. Kaithal, Yamunanagar and Panchkula districts. Regression analysis was done to find the predictive power of independent variables viz. student characteristics include gender, locale, self efficacy, achievement motivation and study habit, teacher characteristics include Teacher attitude towards social science and teaching perspectives and process factor includes classroom environment. Correlation between independent variables and dependent variable viz. value preference was determined. The variables which have significant correlation with value outcome, further Regression analysis was conducted with respect to those variables and it was found that (i) None of the student characteristics viz. gender, locale, achievement motivation, study habit and process factor i.e., classroom environment turn out to be the significant predictor of value based learning outcome. (ii) Among the teacher characteristics: teacher attitude towards social science, social reform teaching perspectives are the strongest predictors of value based learning outcome.</p> Kalpana Thakur Mandeep Kumar ##submission.copyrightStatement## 2025-09-30 2025-09-30 20 03 59 70 10.61410/had.v20i3.253