महाभारतकालीन संस्श्ति में शिक्षा-व्यवस्था एवं उसकी समकालीन उपादेयता (भारतीय ज्ञान.परम्परा के विशेष परिप्रेक्ष्य में)

  • विष्वक्सेन दत्त द्विवेदी अध्यापक एसंस्श्त, उच्च माध्यमिक विद्यालय बसन्तपुरए जिलाकृसिवानए बिहार
Keywords: महाभारतए शिक्षा.व्यवस्थाए गुरु.शिष्य परम्पराए आश्रम.शिक्षाए धौम्यए द्रोणाचार्यए एकलव्यए अर्जुनए अनुभवात्मक अधिगमए स्वाध्यायए विद्या.विनयए भारतीय ज्ञान.परम्परा।

Abstract

महाभारत भारतीय सांस्श्तिक चेतना का केवल महाकाव्यात्मक आख्यान नहींए अपितु धर्मए दर्शनए राजनीतिए समाजए अर्थव्यवस्थाए युद्धविद्याए लोकनीति और जीवन.मूल्यों का विराट ज्ञानकोश है। इसकी कथाभूमि में शिक्षा किसी पृथक् संस्थागत गतिविधि के रूप में न होकर जीवन.निर्माण की समग्र प्रक्रिया के रूप में अभिव्यक्त होती है। आश्रमए आचार्यए अन्तेवासीए गुरु.शिष्य सम्बन्धए सेवाए अनुशासनए अभ्यासए शस्त्र.शिक्षाए शास्त्राध्ययनए अनुभवात्मक अधिगमए परीक्षाए गुरुदक्षिणा तथा चरित्र.निर्माण.इन सभी तत्त्वों का विविध प्रसंगों में सजीव निरूपण मिलता है। प्रस्तुत शोधालेख में महाभारत के आदिपर्वए उद्योगपर्वए द्रोणपर्वए शान्तिपर्व एवं अनुशासनपर्व आदि में उपलब्ध शैक्षिक संकेतों का पाठाधारित एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। विशेषतः धौम्य के शिष्यों उपमन्यु और आरुणि का प्रसंगए द्रोणाचार्य के अधीन कौरव.पाण्डवों की अस्त्र.शिक्षाए अर्जुन की साधनाए एकलव्य का स्वाध्यायए स्त्री.पात्रों की बौद्धिक उपस्थिति तथा शान्तिपर्व की राजधर्मपरक शिक्षा. श्ष्टि को अलग.अलग वैचारिक स्तरों पर पढ़ा गया है। महाभारतीय शिक्षा.श्ष्टि का मूल प्रयोजन केवल दक्षता.प्राप्ति नहींए बल्कि ज्ञान को विनयए आत्मसंयमए कर्तव्यबोधए विवेक और लोकहित से जोड़ना है। इस श्ष्टि से शिक्षा का मूल्य उसके प्रमाणपत्र में नहींए उसके द्वारा निर्मित मनुष्य और उसके आचरण में निहित है। साथ ही एकलव्य.प्रसंग यह भी दिखाता है कि प्रतिभाए संस्थागत मान्यता और ज्ञान तक पहुँच के प्रश्न सदैव सरल नहीं रहेय अतः महाभारतीय शिक्षा.विमर्श का आधुनिक पुनर्पाठ आलोचनात्मक होना चाहिए। समकालीन शिक्षा के संदर्भ में महाभारतीय सूत्रों की उपादेयता गुरु.शिष्य संवादए अनुभवात्मक अधिगमए सतत अभ्यासए स्वाध्यायए बहुविषयकताए नैतिक नेतृत्वए आत्मानुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखी जा सकती है। इन तत्त्वों को आधुनिक लोकतांत्रिकए समतामूलकए वैज्ञानिक और संवैधानिक संदर्भ में रचनात्मक रूप से रूपान्तरित करना ही भारतीय ज्ञान.परम्परा के साथ सार्थक संवाद होगा।

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Published
2026-09-30
How to Cite
द्विवेदीव. द. (2026). महाभारतकालीन संस्श्ति में शिक्षा-व्यवस्था एवं उसकी समकालीन उपादेयता (भारतीय ज्ञान.परम्परा के विशेष परिप्रेक्ष्य में). Humanities and Development, 21(03), 319-324. Retrieved from https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/454