स्वयं सहायता समूह एवं ग्रामीण महिलाओं का सामाजिक सशक्तिकरणरू एक समाजशास्त्रीय अध्ययन
Abstract
स्वयं सहायता समूह भारतीय ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण हेतु एक प्रमुख संस्था के रूप में विकसित हुए हैं। आरंभिक दिनों में ये समूह केवल आर्थिक क्षेत्र जैसे बचत रेड सृजन आजीविका संबंधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के पक्ष से जुड़े थे परंतु समय के साथ उनके कार्य क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में इन समूह का उद्देश्य महिलाओं को मात्र आर्थिक रूप से ही सशक्त करना नहीं है बल्कि इन समूहों ने महिलाओं में आत्मविश्वास, नेतृत्व, सामूहिक निर्णय निर्माण, संस्थागत संपर्क, सामाजिक पूंजी आदि के माध्यम से उनकी सामूहिक सहभागिता को बढ़ाया है जिसके माध्यम से महिलाओं को सामाजिक रूप से सशक्त करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत अध्ययन में महिला सशक्तिकरण की दिशा स्वयं सहायता समूह की भूमिका का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करना है। अध्ययन द्वितीय स्रोतों यथा- शोध पत्रों, अकादमिक रिपोर्ट, प्रकाशित अध्ययन एवं उपलब्ध साहित्य पर आधारित है। पूर्व में किए गए अध्ययनों से यह ज्ञात होता है कि स्वयं सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं की सामुदायिक भागीदारी, निर्णय लेने की क्षमता, परिस्थितियों को नियंत्रित करने की क्षमता, संस्थागत जानकारी आदि में बढ़ोतरी हुई है परंतु अध्ययनों में यह भी स्पष्ट हुआ है की मात्र समूह की सदस्यता ही महिलाओं के सशक्तिकरण का आधार नहीं बन सकती है । परंपरागत पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना, लैंगिक भेदभाव, जाति, स्थानीय शक्ति संबंध, वर्ग आदि महिला सशक्तिकरण को प्रभावित करते हैं। अतः स्वयं सहायता समूह मात्र वित्तीय व्यवस्था नहीं है अपितु इन्हें ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक संबंधों एवं सामूहिक क्षमता के निर्माण करने वाली संस्था के रूप में समझना आवश्यक है।
