आचार्य प्रशांत एवं जगद्गुरु रामभद्राचार्य के आध्यात्मिक चिंतन का तुलनात्मक समाजशास्त्रीय एवं दार्शनिक अध्ययन
Abstract
भारतीय समाज में धर्म एवं आध्यात्मिकता केवल व्यक्तिगत आस्था के विषय नहीं रहे हैं, बल्कि उन्होंने सामाजिक संस्थाओं, नैतिक मूल्यों, पारिवारिक जीवन और सांस्श्तिक चेतना के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई है। आधुनिकता, वैश्वीकरण और डिजिटल क्रांति के समकालीन दौर में आध्यात्मिकता के स्वरूप, भाषा, माध्यम और सामाजिक आधार में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। इसी बदलते परिश्श्य में आचार्य प्रशांत और जगद्गुरु रामभद्राचार्य समकालीन भारतीय आध्यात्मिक विमर्श के दो विशिष्ट प्रतिमानों के रूप में उभरते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र दोनों व्यक्तित्वों के चिंतन का तुलनात्मक समाजशास्त्रीय एवं दार्शनिक विश्लेषण करता है। आचार्य प्रशांत जहाँ आधुनिक मनुष्य के लिए अद्वैत वेदान्त को प्रश्न, विवेक और डिजिटल संप्रेषण के माध्यम से पुनर्व्याख्यायित करते हैं, वहीं जगद्गुरु रामभद्राचार्य शास्त्र, परंपरा, रामभक्ति तथा संस्श्त भाष्य के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक विरासत की निरंतरता को संस्थागत रूप से पुनर्स्थापित करते हैं। यह अध्ययन प्रतिपादित करता है कि दोनों के दार्शनिक निष्कर्षों में भिन्नता के बावजूद, उनका अंतिम लक्ष्य मानव चेतना का आंतरिक रूपांतरण ही है।
