ग्रामीण क्षेत्रों में शिशुओं एवं छोटे बच्चों के पूरक आहार व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक - एक समीक्षात्मक अध्ययन
Abstract
बाल्यावस्था के प्रारम्भिक वर्षों में मिलने वाला पोषण बच्चे की वृद्धि, प्रतिरक्षा, मस्तिष्कीय विकास तथा उसकी समग्र स्वास्थ्य स्थिति को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण आधार है। शिशु के जीवन के प्रथम छह माह में स्तनपान उसकी पोषण आवश्यकताओं की पूर्ति में केंद्रीय भूमिका निभाता है। लगभग छह माह की आयु के बाद बच्चे की शारीरिक वृद्धि के साथ ऊर्जा एवं पोषक तत्वों की आवश्यकता में वृद्धि होती है। इस अवस्था में स्तनपान को जारी रखते हुए बच्चे की आयु, विकासात्मक अवस्था और पोषण संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त पूरक आहार देना आवश्यक हो जाता है। ग्रामीण परिवारों में पूरक आहार से संबंधित निर्णय और व्यवहार अनेक परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होते हैं। परिवार में उपलब्ध भोजन की मात्रा मात्र यह निर्धारित नहीं करती कि बच्चे को कैसा आहार प्राप्त होगा। माता की शैक्षिक पृष्ठभूमि, पोषण संबंधी समझ , परिवार की आर्थिक स्थिति, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता एवं विविधता स्थानीय भोजन परंपराएँ, पारिवारिक विश्वास, माता की दैनिक व्यस्तताएँ, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच तथा परिवार के सदस्यों से मिलने वाला सहयोग भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत समीक्षात्मक अध्ययन का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में शिशुओं के पूरक आहार व्यवहार को प्रभावित करने वाले प्रमुख सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक एवं पोषण संबंधी कारकों का उपलब्ध साहित्य के आधार पर विवेचन करना है। अध्ययन से यह निष्कर्ष सामने आता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पूरक आहार संबंधी सुधार के लिए ऐसी रणनीतियों की आवश्यकता है जो केवल सूचना देने तक सीमित न रहें, बल्कि परिवार की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखें। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध एवं अपेक्षाश्त कम लागत वाले पौष्टिक खाद्य पदार्थों के उचित उपयोग, व्यवहारिक पोषण परामर्श, परिवार के सहयोग तथा आंगनवाड़ी एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के निरंतर मार्गदर्शन को इस दिशा में उपयोगी माना जा सकता है। अतःशिशुओं के लिए प्रभावी पूरक आहार को बढ़ावा देने हेतु पोषण शिक्षा के साथ सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को भी समान महत्व देना आवश्यक है। भविष्य के अध्ययनों में ग्रामीण परिवारों की स्थानीय खाद्य परंपराओं, व्यवहारगत बाधाओं तथा उपलब्ध पोषण सेवाओं की भूमिका का क्षेत्र-विशिष्ट अध्ययन किया जाना उपयोगी रहेगा।
