भारतीय ज्ञान परम्परा की दृष्टि से सतत विकास: एक समग्र विमर्‛ा

  • योगेन्द्र प्रसाद त्रिपाठी पूर्व आचार्य, समाज‛ाास्त्र विभाग, का0सु0 साकेत पी0जी0 कालेज अयोध्या।
  • नीलम त्रिपाठी पूर्व सदस्य जिला कि‛ाोर न्याय बोर्ड, फैजाबाद।
Keywords: .

Abstract

भारतीय ज्ञान परम्परा (प्दकपंद ज्ञदवूसमकहम ज्तंकपजपवद) विश्व की प्राचीनतम एवं सतत विकसित होने वाली ज्ञान प्रणालियों में से एक है। यह केवल दार्शनिक चिंतन या धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन के समग्र संतुलन, प्रश्ति के साथ सह-अस्तित्व, सामाजिक समरसता तथा सतत विकास (ैनेजंपदंइपसपजल) की अवधारणा पर आधारित रही है। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट, उपभोक्तावाद और सामाजिक असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भारतीय ज्ञान परम्परा स्थिरता (ैनेजंपदंइपसपजल) का एक वैकल्पिक एवं मानवीय मडल प्रस्तुत करती है। भारतीय श्ष्टिकोण में स्थिरता केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि प्रश्ति, समाज और मानव जीवन के बीच संतुलित संबंध की स्थापना है।

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Published
2026-09-30
How to Cite
त्रिपाठीय. प., & त्रिपाठीन. (2026). भारतीय ज्ञान परम्परा की दृष्टि से सतत विकास: एक समग्र विमर्‛ा. Humanities and Development, 21(03), 164-170. Retrieved from https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/428