भारत एक राष्ट्र के रूप में

  • अखिलेश कुमार शोध छात्र, इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डॉॅ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या
  • अवध नारायण एसो. प्रोफेसर, इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डॉॅ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या
Keywords: राष्ट्र, राज्य, संस्कृति, आक्रान्ता, अखण्ड, परम्पराएँ, चिन्तन, द्रष्टा, मनीषी, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वधर्म समभाव आदि।

Abstract

भारतीय चिन्तन परम्परा में एक राष्ट्र के रूप में भारत का स्वरूप अपने आप में एक अत्यत्न व्यापक अवधारणा को समाहित किये हुए है। भारत लम्बे समय तक विदेशी आक्रान्ताओं के अधीन रहा जिसके कारण समाज में अनेक विविधताएँ दृष्टिगोचर हुई लेकिन फिर भी भारतीय समाज अपने मूल सिद्धान्तों को आत्मसात किये रखा। और अपने सांस्कृतिक बंधन को बनाये रखा। जिसने चिरकाल से ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकता की डोर में बांधे रखा है। जहां पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा नस्लीय, जातीय और राज्य आधारित है। जिसकी तुलना भारत से नहीं की जा सकती है। भारत का प्राकृतिक स्वरूप ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है। जिसका भाव अतीत काल से लेकर वर्तमान काल तक निरिन्तर प्रवाहमान दिखाई दे रहा है। त्योहार, रीति-रिवाज परम्पराएँ इतिहास, भूगोल आदि के माध्यम से राष्ट्र की अभिव्यक्ति होती है। राष्ट्र भारतीय राजनीतिक चिंतन परम्परा का आधार रहा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में दर्शन हमें हमारे मनीषियों द्वारा किये गये वैदिक मंत्रों में स्पष्ट दिखाई देता है। इस तरह के राष्ट्र की मान्यता पाश्चात्य चिन्तन में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है।

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Published
2025-09-30
How to Cite
कुमारअ., & नारायणअ. (2025). भारत एक राष्ट्र के रूप में. Humanities and Development, 20(03). Retrieved from https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/299