गुप्तकाल में भू-राजस्व व्यवस्था: एक पुनरावलोकन

  • महेन्द्र पाठक पूर्व अध्यक्ष, प्राचीन इतिहास, का.सु. साकेत स्नात्तनकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या
  • अजय मिश्र ॉाोध छात्र, प्राचीन इतिहास, का.सु. साकेत स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या

Abstract

वि‛ााल केन्द्रीकृत मौर्य सत्ता के पराभव के प‛चात् भारत की जर्जर राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाते हुए विदे‛ाी आकान्ताओं ने लगातार इस भू- भाग पर अपना अपना अधिपत्य जमाया हैं। इस राजनैतिक विसंगति को समाप्त करने के लिए भारत के तीन भाग से तीन राजवं‛ाो - प‛िचम में नाग राजवं‛ा , द. में वाकाटक और पूर्व में गुप्त राजवं‛ा का अभ्यूदय हुआ। इन तीनों राजनैतिक ॉाक्तियों ने विदे‛ाी ॉाक्तियों को पराजित करके भारत में नवीन राजनीतिक धारा का प्रतिपादन किया। यदि इन ॉाक्तियों में ही पारस्परिक द्वन्द्व या कलह होता तो सम्भवतः इस उद्दे‛य को सफलता न मिल पाती किन्तु गुप्त राजसत्ता का महत्व इस तथ्य में निहित है कि गुप्त‛ाासकों ने अपनी कूटनीतिक योग्यता का परिचय देते हुए इन ॉााक्तियों को वैवाहिक सूत्र में अनुबन्धित कर परोक्ष या अपरोक्ष रूप में इन सबको अपना नेतृत्व प्रदान करते हुए एक ॉाक्ति‛ााली साम्राज्य स्थापित किया। स्मिथ के अनुसार इस वैवाहिक सम्बंध के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त ने लिच्छवियों का राज्य प्राप्त कर लिया तथा मगध एवं उसके सीमावर्ती क्षेत्र का सार्वभौम ॉाासक बन गये।1

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Published
2024-12-30
How to Cite
पाठकम., & मिश्रअ. (2024). गुप्तकाल में भू-राजस्व व्यवस्था: एक पुनरावलोकन. Humanities and Development, 19(04), 14-19. Retrieved from https://www.humanitiesdevelopment.com/index.php/had/article/view/233